परमेन्द्रको पढनेके बाद

November 7, 2006 at 5:41 am Leave a comment

– By S.B. Shrestha

परमेन्द्र भगतका “गिरजा, माधव, प्रचण्ड सब एक जैसे हैं” पढकर मैँ बहुत चौँक गया था । मुझे मालूम नहीँ था की तराईके लोग ईतना आक्रोशीत हो चुके है पहाडीयोँ के शोषण और दोहन से । इसमे कोई शक नहीँ है की जसि तरह से चीनमेँ एक देश दो सिस्टम चल रहा है, उसी तरहसे नेपालमेँ भी दो तप्केके लोग मुलुक खुद पैदा कर रहा है । काठमान्डुमेँ पलबढकर भि मधेशके लोगोँके साथ मेरा एक स्नेह रहनेका कारण दादाजीका ब्यापार हि था । दादाजीके बहुत से ब्यापारीक मित्र तराई के थे और उनका हमारे परिवारका शादी-दावतमेँ आनाजाना होता रहता था । इसके अलावा दुसरा कारण था-रक्सौलमेँ उस वक्त चल रहा “शोले” देखनेकी ललक । बीरगँज जाने और “शोले” देखनेके लिए हम भाईयोँके बीच एक किश्मका होड सा चला हुवा था और उसके लिए हम सभि चाचाजीओँसे जब कभि घरमे दिखते तो हम घेरकर मिन्नते करना शुरु कर देते थे ।

पता नहीँ नौँ-दश सालके लडके भी कैसे लालची र मतलबी हो जाते हैँ । शायद बडोँसे ही सीखते हैँ वह । हाँ, काठमान्डुमेँ भीडीयोका प्रवेश हो चुका था उस वक्त-तबसे हमने भि तराईके चाचाओँको उतना भाव देना छोड दिया था। क्योँकी अब “शोले” और “क्रान्ती” देखनेके लिए रक्सौल जाने कि जरुरत नहीँ था । हम पूर्णरुपसे मतलबी हो चुके थेँ और कुछ दुसरी कीसमका कीडा हमारा दीमागमेँ कुलबुला रहा था । और वह था तराईके लोगोँके साथ बहुत बूरी तरह से पेश आना । नेवार परीवारके सदस्य होनेके कारण शायद हमेँ तराईके लोग माफ कर सकते हेँ । नेवार लोग खुद नेपाली अच्छी तरह से बोल नहीँ सकते हेँ। मेरी दादी जब भी घर मेँ मेहमान अाते थे, तब उपर जाईयेकी जगह “तल जानुस” कहती थी। नेपाली अच्छी तरह से नबोल पाने के वजहसे काठमाडौँके नेवार लोगोँने भी अच्छा योगदान दिया हे मधेशीयोँकी ओर बूरी तरहसे पेश आने मेँ । इस बात मे कोई भी शक नहँी हे की काठमाडौँने मधेशको बहुत दु:ख और ठेश पहँुचाया है । लेकीन, आम आदमीका रवैया जैसा भी हो- (इसमेँ भी सुधार होना बहुत जरुरी है,) कोई भी देश अपनी नागरीकके तरफ दोगला ब्यवहार नहीँ कर सकता है ।
नेपालका सबसे बडा समस्या जातीवाद और सम्प्रदायवादके साथ-साथ क्षेत्रीयतावाद भी हे । काठमाडौँके अन्दर देखो त नेवार खुद ही एक-आपसमेँ बटेँ हुए हैँ-हाँ उनके लीए एकही सुत्र भाषा की है। लेकीन जब भाषाकी बात आती है, तो पुरा पहाडी लोग पुरी तरह से विभाजीत है । उसी तरह से दलीत और गैर-दलीतका सवाल भी जबरजस्त रुपसे उठ रहा है, पहाडीयोँ के बीचमे । हम ईन्कार नहँी कर सकते हैँ की ईसकिश्मका विभाजन और दरारेँ तराई मेँ नहीँ है । मेँ तो जीधर भी देखता हँु, बस तोडनेका सुत्र ही देखता हुँ और जोडने की सुत्र ढुँढना बहुत मुश्कीलसा मालूम होता है । नेपाली लोग नेपालके अन्दर ही नहीँ, बाहर भी विभाजीत है । नेवार-नेवारके साथ ही रहता है तो ईसी तरहसे दुसरे तपकेके लोग भी अपना ही तपकेके लोगोँके साथ ही रहता है । मेँ अचम्मीत होता हुँ जब पढे-लिखे हुए लोग ईस किस्मका ईन्टलेक्च्युल घेट्टोआईजेशनमेँ विश्वास करते हैँ-विदेश मेँ भी ।

मेरे ख्यालमेँ भाषा, क्षेत्र और आत्मसम्मान हमारे लिए बहुत मायने रखते हैँ । लेकिन जीन्दगीके सामने ये सब चिजेँ उतना मायने नहीँ रखते हैँ। तराईमेँ आज सबसे बडा तनाव लोगोँके जीवनशैली और जीवनस्तरसे जुडा हुआ हे। जीस आदमीके पास खानेके लीए कुछ नहीँ और जीसका जीवन दो पलका है-उनके लीए कितना आरक्षण होगा और कौन उनका रक्षक होँगे उतना मायना नहीँ रखता है । ये आरक्षण और प्रतिनिधीत्वकी बातेँ नेता लोग करते हैँ और वो लोग करते हँै जीनको अपना नेतागीरीका भूत चढा हुआ है । ठीक है नेतागीरी होना चाहीये – लेकिन तोडनेकी शर्त मे कभी नहँी । भडकाव जीस किस्मका भी वो नेपालमे शान्ती और स्थायीत्वके लीए अच्छा नहीँ है । अभी दश सालका माओवादी विद्रोहका खात्मा नहीँ हुआ है, की दुसरा भडकावका खतरा बढ रहा है। ठीक है चुनावोँमे सफाया होता है तो इसमे कोई समस्या नही क्योँकी नेपालका अगला प्रधानमन्त्री या राष्ट्रपती तराई से भी हो सकता है र होने से कुछ बिगडने वाला भी नहँी है । बस डर इस बातका है की यह सफाया वगैरहके चक्करमेँ देशका बँटवारा ना हो जाएे ।

source::http://sbshrestha.blogspot.com/2006/11/blog-post.html

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