भारत की नीति व नेपाल की नीयत पर टिका सुस्ता का भविष्य

December 11, 2006 at 3:49 am Leave a comment

भारत की नीति व नेपाल की नीयत पर टिका सुस्ता का भविष्य

बगहा (प.च.) [अमन कुमार]। नेपाल से लगती सीमा पर स्थित सुस्ता का भविष्य अब केंद्र सरकार की नीति व नेपाल सरकार की नीयत पर जा टिका है। कारण, सीमा के दोनों ओर सुस्ता एक भावोत्तेजक मसला बन चुका है। एक ओर अस्थिर गंडक के कोख से पनपी सुस्ता पर कब्जा बरकरार रखने को नेपाल की ओर से हर-हाल में बहाल रखने की कड़ी जद्दोजहद की जा रही है, दूसरी ओर अर्से बाद थोड़ी बहुत संवेदनशील हुई अपनी सरकार की कार्रवाइयों से इधर के लोग सौ आस लगा बैठे हैं। सीमा पर नये सिरे से सीमांकन की कवायद की खबर से कई लोगों की आंखें भी चमकी है। कारण, ज्योग्राफिकल सर्वे आफ इंडिया की टीम का बीते सप्ताह इलाके में पहुंचना है। दोनों देशों की प्रस्तावित उच्चस्तरीय दो महत्वपूर्ण बैठकों (भिस्वा और रक्सौल) के परिणामों की ओर क्षेत्रीय लोग बड़ी संजीदगी से टकटकी लगाये बैठे हैं। यथास्थिति के भय से भी कम लोग ग्रसित नहीं।
   लगभग आधी शताब्दी में हुए कई महत्वपूर्ण बैठकों का लव्वोलुवाब यथास्थिति के नाम पर निपटाया जाता रहा है जिसके हश्र इस पार के लोग देखते व भुगतते आ रहे हैं। पश्चिम चम्पारण का सुस्ता अब नेपाल के अधिपत्य में है जो जिले के लोगों के लिए किसी कष्टकर नासूर से कमतर नहीं।
   सुस्ता के नाम पर भारत सरकार को नेपाल के साथ यथावत स्थिति कायम रखने का निर्णय उस समय भी लेने को मजबूर होना पड़ा था जब 24 मई 1964 को भारत-नेपाल सीमा अवस्थित वाल्मीकिनगर (तब का भैंसालोटन) में अति महत्वकांक्षी गंडक सिंचाई परियोजना के तहत बराज का शिलान्यास प्रस्ताव तय हो चुका था। सुस्ता समेत अन्य तटवर्ती भूमि पर जोत आबाद को लेकर 23 जनवरी 1964 को भारतीय क्षेत्र में स्थित रमपुरवा के ग्रामीणों तथा नेपाली शाही सेना के बीच भयानक खूनी संघर्ष हुआ जिसमें कुल मिलाकर सात लाशें सुस्ता की धरती पर आ बिछी थी। हृदयविदारक घटना के बावजूद भारतीय नीति-निर्धारकों की कूटनीति अलग थी। कहते हैं कि तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू का सुझाव रहा कि यदि भारत खुनी संघर्ष की उधेड़बुन में रहा गया तो गंडक बराज जैसे महत्वपूर्ण योजना का शिलान्यास अधर में लटक जायेगा। सबको शिलान्यास की चिंता लगी रही। परिणाम, 25 एवं 26 फरवरी 1964 को कोतराहां वन विश्राम गृह में दोनों देशों के उच्चाधिकारियों की घंटों चली मैराथन वार्ता। निष्कर्ष, जब तक दोनों देशों की संयुक्त सीमा की पैमाइश नहीं हो जाती, यथास्थिति बनाये रखा जायेगा। फिर एक तरफ चलता रहा बराज निर्माण, दूसरी तरफ नेपाली अतिक्रमणकारी बढ़ाते रहे सुस्ता की सीमा। जिला प्रशासन की थोड़ी तंद्रा टूटी तो तब सुस्ता में यथास्थिति का ख्याल किया गया। तब सुस्ता में कोई नया निर्माण कार्य न हो इसकी देखरेख के लिए सरकार की ओर से एक जीप तथा सशस्त्र गश्ती पुलिस की प्रतिनियुक्ति भी की गयी। लेकिन बाद में विभागीय पहल भी ठप पड़ गयी।
   वाल्मीकि वन प्रक्षेत्र वन निगम को सौंपे जाने के पूर्व तक सुस्ता का क्षेत्रफल लगभग 200 हेक्टेयर था। एक दस्तावेज के मुताबिक, 30 मई 1975 को पश्चिम चंपारण के डीएम एच.एस.सिन्हा एवं एसपी आर. राम ने जब सुस्ता का निरीक्षण किया था, उस समय वहां 553 परिवार में से दो-ढाई दर्जन ही नेपाली थे जिनकी मतदाता सूची तक नहीं बनी थी। यथास्थिति का कमाल है कि आज परिवारों की संख्या वहां तीन गुनी बढ़ी हुई है। जीपीएस सिस्टम की पैमाइश विधि अनुसार निकली 3.75 वर्ग किमी के क्षेत्रफल में फैल चुकी सुस्ता में दर्जनों पक्के मकान है। पहले सिर्फ नेपाली थाना था, अब शाही सेना का अवतरण सुस्ता की भूमि पर हो चुका है। जो दिन-रात अपनी विस्तारक गतिविधियां चला भारत सुरक्षा एजेंसियों के तैनाती को चुनौती देते रह रहे हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार वन भूमि अतिक्रमण से अब तक भारत व बिहार सरकार को 860 करोड़ रुपये की वन संपदा का नुकसान उठाना पड़ा है। नरसैया जंगल (जीपीएस सिस्टम के अनुसार क्षेत्रफल 11.43 वर्ग किमी) पर नेपाल का अधिपत्य कोढ़ में सर्वाधिक पीड़ा दायक खाज है। इससे इतर रोचक व महत्वपूर्ण तथ्य यह कि क्षेत्र के बुर्जुग आज भी यह मानने को तैयार नहीं कि सुस्ता प्राचीन गांव है। बहुतेरों का कहना है कि वाल्मीकिनगर थाना क्षेत्र के बलगंगवा, परसौनी, चकदहवा व रामपुरवा ग्राम का तटवर्ती भूखंड ही आज का सुस्ता है। जिस पर नेपाली अतिक्रमणकारियों का राज हो चला है। सबका यह कथन तब अधिक संपुष्ट होता जब 1920-21 के सर्वे में सुस्ता नामक गांव ढूंढे नहीं मिलता। पूरी अतिक्रमित भूखंड मदनपुर वन कक्ष संख्या 26,27 एवं 28 का क्षेत्र है जो फिलवक्त वाल्मीकि व्याघ्र परियोजना के अधीन है। और प्रेक्षक कदाचित यह कहने से नहीं हिचकते कि सुस्ता के प्रादुर्भाव में भारत सरकार व वन विभाग के ढु़लमुल नीतियों का भी बड़ा हाथ है। नेपाल के नीयत का आलम यह है कि बार-बार सुस्ता को अपना सिद्ध करने का पाशा फेंक रहा है। बताते हैं कि 4 अप्रैल 1988 को नेपाल के सिमरी में दोनों देशों के अधिकारियों की बैठक हुई तो उस समय नेपाली अधिकारियों ने ऐसा मानचित्र पेश किया किया जिसमें कई सीमावर्ती भारतीय गांवों व भारतीय वन खंड को नेपाल के हिस्से में दर्शाया गया था किंतु तब जिला प्रशासन उसका विरोध तक नहीं किया। यथास्थिति की द्विपक्षीय निर्णयों को तीलांजलि देकर 15 सितंबर 2005 के देर शाम तक सुस्ता में जमे नेपाली सिमाविद् व कतिपय अधिकारी ने फिर वैसा ही नक्शा सुस्ता में रह रहे लोगों के समक्ष परोस नेपाल का दावा मजबूत किया। वर्तमान सुस्तावासियों को कपोलकल्पित न्याय दिलाने की घुट्टी भी पिलायी गयी जिसके परिणाम में ही नेपाली शाही सेना का साजो-सामान संग 21 अक्टूबर 05 को हेलीकाप्टर से कई खेप उतरना भी हुआ। लेकिन भारत.., यहां तब पूरा सरकारी तंत्र राज्य के विधान सभा चुनाव में व्यस्तता के नाम पर दम साध गयी। फिर नयी राज्य सरकार के गठन के तुरंत बाद नेपाल के नवलपरासी में दोनों देशों के उच्चाधिकारियों की संपन्न हुई बैठक में पुन: यथास्थिति बहाली की डफली बजा दी गयी।
   अहम प्रश्रन् यह दोनों देशों के आयुक्त सदस्यों से 1929 में गठित संयुक्त सीमा आयोग द्वारा तैयार किये गये नक्शे को अस्वीकृत करने वाले नेपाल के नीयत पर भरोसा जता भारत कैसी यथास्थिति की बहाली चाहता है? मसला अंतर्राष्ट्रीय है सो दोनों देशों की सर्वसम्मति किसी भी मुद्दे पर लाजिमी है, लेकिन ताली सिर्फ एक हाथ से बजाने का भारतीय प्रयास क्षेत्रीय प्रेक्षक असानी से नहीं पचा पा रहे हैं। वह भी तब जब इतने गंभीर मसले को मीडिया द्वारा प्रचारित-प्रसारित किये जाने के बाद भारतीय प्रशासनिक तंत्र सीमा विवाद को संवेदनशील मुद्दा बन जाना मानती हो। विवादास्पद हिस्सों का मुआयना करने को देहरादून से ज्याग्राफिकल सर्वे आफ इंडिया की एक टीम मोतिहारी बीते सप्ताह ही पहुंची है लेकिन इसकी बैठक को लेकर अनिश्चितता के कारण सीमाई क्षेत्रों में चर्चाओं का बाजार गरम है।
  

Source::http://www.jagran.com/special/inner.aspx?idfeature=212

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