दोयम दर्जे की जिंदगी जीने को मजबूर हैं नेपाली मधेशी

December 11, 2006 at 3:49 am Leave a comment

दोयम दर्जे की जिंदगी जीने को मजबूर हैं नेपाली मधेशी

नई दिल्ली [सत्येन्द्र सिंह]। नेपाल के तराई अंचल में रहने वाले मधेशी समुदाय के लोगों का दुर्भाग्य उनका पीछा छोड़ता नजर नहीं आता। नेपाल सरकार के हाल के एक फैसले ने दोयम दर्जे की जिंदगी जी रहे इन लोगों की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। फैसले के मुताबिक तराई में पब्लिक स्कूलों में पढ़ाने वाले गैर-नेपाली मूल के लोगों को अध्यापन के लिए लाइसेंस लेना अनिवार्य होगा। इससे नागरिकता विहीन नेपाली मधेशी और भारतीय दोनों प्रभावित होंगे। करीब दस हजार लोग बेरोजगार हो जाएंगे। राहत की बात बस यही है कि अभी यह लागू नहीं हुआ है। इनकी रहनुमाई करने वाली नेपाल सद्भावना पार्टी (ए) ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए नागरिकता के मसले को फिर उछाल दिया है। पार्टी के संयुक्त महासचिव अनिल कुमार झा के मुताबिक करीब एक करोड़ पंद्रह लाख की आबादी वाले नेपाली मधेशी में से चालीस लाख से ऊपर मधेशी अब भी नेपाल की नागरिकता से वंचित हैं। इसलिए जब तक यह समस्या सुलझ नहीं जाती, इन शिक्षकों के बारे में किए गए इस फैसले का कोई औचित्य नहीं है। यह विडंबना ही होगी कि मधेशी समुदाय को अपनी मातृभूमि में काम करने के लिए इजाजत पत्र लेनी पड़ेगी। मालूम हो कि बिहार और उत्तर प्रदेश की उत्तरी सीमा से सटे नेपाल की तराई के इलाके को मधेश कहा जाता है और वहां के मूल निवासियों को मधेशी। वहां पहाड़ से आए लोग भी रहते हैं, जिन्हें मधेशी नहीं कहा जाता। सनद रहे कि वहां पहाडि़यों को ही नेपाल का मूल निवासी माना जाता है; जबकि कुछ प्रजातियों को छोड़ दिया जाए, अधिकतर नेपालियों का मूल भारत से ही जुड़ा बताया जाता है। मधेशी समुदाय भी खुद दो भागों में बंटा हुआ है-एक वह है जो नेपाल का नागरिक है और दूसरा वह जो वहां का नागरिक नहीं है। इन दोनों के अधिकारों में भी भारी अंतर है। जिस मधेशी को नागरिकता प्राप्त है, वह नेपाली है; जिस मधेशी को नागरिकता प्राप्त नहीं है, वह नेपाली नहीं समझा जाता यानी वह किसी देश का नागरिक नहीं है। अनिल झा इसे एक गंभीर मसला बताते हुए कहते हैं कि उनके पास राष्ट्र तो है, लेकिन राष्ट्रीयता नहीं है। इसके लिए वे नेपाल के पूर्व नरेश महेंद्र की राजनीति को जिम्मेदार ठहराते हैं, जिन्होंने मधेशी समाज में यह विभाजन कराया। जमीन के कुछ टुकड़े के लालच में वहां के गरीबों को यह कीमत चुकानी पड़ी। साठ के दशक में जब नागरिकता और भूमि सुधार संबंधी कानून लागू हो रहा था, तब उन्हें नागरिकता के बजाय जमीन चुनने को मजबूर होना पड़ा था। समझा जाता है कि इस कार्य में स्थानीय जमींदारों ने अहम भूमिका निभाई थी। वैसे नागरिकता प्राप्त मधेशी भी अपने आपको मुख्यधारा का नेपाली महसूस नहीं करता। काठमांडो स्थित एक गैर-सरकारी संगठन से जुड़े राजनीतिक विश्लेषक जय निशांत बताते हैं कि नेपाल में मधेशी लोगों को भारतीय मूल का समझा जाता है और इनकी राष्ट्र के प्रति निष्ठा पर भी संदेह किया जाता है। नेपाल की मौजूदा कुल दो करोड़ साठ लाख की आबादी में मधेशी समुदाय की संख्या आधी से थोड़ी ही कम है, लेकिन सरकारी नौकरियों में इनका यह अनुपात नहीं है। सेना, पुलिस, राजनयिक सेवा आदि विभिन्न प्रकार की सरकारी नौकरियों में ये उपेक्षित हैं। नेपाली संसद में भी आबादी के हिसाब से इनका प्रतिनिधित्व नहीं है। तराई क्षेत्र के स्कूलों में पहली भाषा के रूप में नेपाली ही पढ़ाई जाती है, जबकि इस क्षेत्र में मैथिली, भोजपुरी, अवधी, थारू आदि भी प्रमुखता से बोली जाती है। हालांकि हिंदी को द्वितीय राजभाषा बनाने की बात काफी पहले उठ चुकी है, लेकिन सरकार इसे यह दर्जा नहीं देना चाहती। निशांत के मुताबिक सरकार को लगता है कि हिंदी को बढ़ावा देने से नेपाल का और ज्यादा भारतीयकरण हो जाएगा। अगर हिंदी टीवी चैनलों को वहां दिखाया जाता है, तो यह उनकी मजबूरी है; क्योंकि नेपाल का मनोरंजन उद्योग काफी पिछड़ा है। मधेश के इस पिछड़ेपन के लिए अनिल कुमार झा यहां की सरकार को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराते हैं, जिसने जान-बूझकर इस क्षेत्र को पिछड़ेपन के गर्त में धकेल दिया। अपने कथन के समर्थन में वे कहते हैं कि मधेश कभी पहाड़ से काफी आगे था। जो भी हो, मधेशी समुदाय की इन्हीं शिकायतों के मद्देनजर 1990 में गजेंद्र नारायण सिंह के नेतृत्व में एक पार्टी -नेपाल सद्भावना पार्टी- का गठन किया गया। लेकिन आंतरिक गुटबाजी व टूट-फूट, संगठनात्मक दोष, सक्षम नेतृत्व की कमी व किंचित जातीय चेतना के चलते यह पार्टी ज्यादा मजबूत नहीं हो पाई और निरंतर कमजोर होती गई। यहां नेपाली कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूएमएल) का भी अस्तित्व है। लेकिन ये दोनों पार्टियां यहां से जिन लोगों को उम्मीदवार बनाती हैं, उनमें मधेशी लोगों को अपेक्षित जगह नहीं देतीं। इनकी ताकत के चलते जनता भी यह मानती है कि उनकी भलाई इन्हीं के जरिये संभव है। यही कारण है कि नेपाल सद्भावना पार्टी 205 सदस्यीय नेपाली संसद में कभी भी छह से ज्यादा सीट नहीं जीत पाई, जबकि नेपाली कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूएमएल) का यहां दबदबा बरकरार रहा। इस तरह उनकी बदहाली का सिलसिला अब भी जारी है। वर्तमान समय में वहां राजा के खिलाफ चल रहे राजनीतिक आंदोलन का भी उनकी समस्याओं पर ध्यान नहीं है।

Source::http://www.jagran.com/special/inner.aspx?idfeature=201

Advertisements

Entry filed under: Uncategorized.

भारत की नीति व नेपाल की नीयत पर टिका सुस्ता का भविष्य HUMAN RIGHTS OF INDIGENOUS MADHESHI PEOPLE IN NEPAL

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

Trackback this post  |  Subscribe to the comments via RSS Feed


Celebration of 1,00,000

Madhesi Voice

United We Celebrate

People Celebrating faguwa (Holi), with the fun of music, quite popular among Terai people. Holi is celebrated each year on the eve of falgun purnima Faguwa (Holi) Celebration

Past Posts

Archives

Enter your email address to subscribe to this blog and receive notifications of new posts by email.

Join 46 other followers


%d bloggers like this: