िफर से कह दो एक बार इन्िकलाब

December 30, 2006 at 8:50 am 2 comments

िफर से कह दो एक बार इन्िकलाब

–Paramendra Bhagat 

िफर से कह दो एक बार इन्िकलाब
मधेशके िमट्टीकी कसम
तूफान खडी कर दो
ले लो कब्जे में
झापासे कञ्चनपुर
एक क्रान्ित िफर से कर दो

बगावत हो जाएगी
छयालीस सालकी बात थी
गजेन्द्र बाबुने कहा
पहाडी राजाने पहाडीयोको प्रजातन्त्र िदया
हमें क्या िदया
एक क्रान्ित िफर से कर दो

लोकतन्त्रकी बात करते ये पहाडी
लेिकन उनके लोकतन्त्रमें
एक व्यक्ित एक मत नहीं होता
नहीं तो बराबर जनसंख्या पर
संसदीय सीटे होती
एक क्रान्ित िफर से कर दो

सात सालमें मधेसीको बन्दूक थमाया कृष्ण प्रसादनें
क्रान्ित की मधेसीके कन्धे पर बन्दूक रखके
छयालीस सालमें प्रधानमन्त्री बना तो उसने कहा
मधेसी कायर होते हैं
इसी िलए नहीं भर्ती करते हम सेना में
एक क्रान्ित िफर से कर दो

दश साल पहले पहाडीयोनें अाँकरा बनाया
बयालीस लाख बगैर नागिरकता पत्रके हैं
अाज वो दश साल बाद तीस लाखको नागिरकता पत्र
देने जा रहे हैं
ऐसी बर्ताब रही तो टूट जाएगी देश
एक क्रान्ित िफर से कर दो

िकसी भी मानवको नागिरकता पत्रसे वञ्िचत करना
मानव अिधकारका हनन है
िलखा है मानव अिधकारके घोषणापत्रमें
लेिकन पहाडी मानव अिधकारवादी संगठनें
चूं नहीं बोल्ते
एक क्रान्ित िफर से कर दो

पृथ्वी शाहके राजा बननें से हजारो साल पहले
एक राजा जनक हुवा करते थे
अाज ये िमिथलावासीको भारतीय कहनेका
दुस्साहस करते हैं
ले लो वतन या दे दो वतन
एक क्रान्ित िफर से कर दो

जनसंख्या है हमारे पास
एक व्यक्ित एक मतका लोकतन्त्र अा जाए
तो राज्य पर होगा हमारा कब्जा
लेिकन वो कह रहे नहीं चािहए वैसा लोकतन्त्र
ले लो उसे िछनके
एक क्रान्ित िफर से कर दो

पत्ता साफ करो मोरङसे कोइराला खान्दानका
राणा गए, शाह गए, कोइराला भी जाएंगे
जमानत जफ्त करो माधव नेपालका
रौतहटमें, प्रचण्डको कहो काठमाण्डुमें ही रहे
िचतवन हमारा है
एक क्रान्ित िफर से कर दो

हेम बहादुर धनुषासे िजते
शरद िसंह महोत्तरीसे
ये क्या नौटंकी है
िजता है क्या कोइ यादव
काठमाण्डुसे
एक क्रान्ित िफर से कर दो

एमालेवाले चीनका हँसुवा हथौडावाला झण्डा
टाङ्ते है
कोइ अापत्ित नही िकसीको
सद्भावनाके झण्डाको कहते हैं
भारतका ितरङ्गा है
एक क्रान्ित िफर से कर दो

अपने अापको मधेसी क्यों बोल्ते हो
नेपाली बोलो कहते हैं
बोलो उनको, मानवताके उचाइको देखो
संकीर्ण िवचार छोडो, मानव बोलो,
नेपाली क्यों बोल्ते हो
एक क्रान्ित िफर से कर दो

िहन्दी ही तो है मधेशकी पहचान
नहीं तो मधेशी, भोजपुरी, अविध, उर्दुमें बँटे हैं
िहन्दी ही तो है पुरे मधेशको एक करती है
सम्पर्क भाषा है
िहन्दीको उसकी जायज जगह दो
एक क्रान्ित िफर से कर दो

अिधकार भीख की तरह नहीं माँगी जाती
अिधकार तो िछन्ना परता है
तमुनेे अप्िरलमें जैसे िछना
अप्िरल क्रान्ितका शंखघोष तुमने
जनवरी १२ को जनकपुरमें िकया
एक क्रान्ित िफर से कर दो

ललकारो उन मधेशीयोको
जो अात्मघृणाका भाषा बोल्ते हैं
गाँव गाँवमें जाअो
संगठन िवस्तार करो
उजाला फैलाअो
एक क्रान्ित िफर से कर दो

मधेशके िमट्टीकी कसम
िफर से कह दो एक बार इन्िकलाब

Source::http://demrepubnepal.blogspot.com/2006/12/blog-post_29.html

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Historical::Administrative Arrangements in the Eastern Historical:: Kingdom of Vijayapur in 1770 AD

2 Comments Add your own

  • 1. Sambhu sah  |  December 30, 2006 at 3:42 pm

    Dear Paramendra Ji,
    The poem is great and it touches the heart of loyal Madhesi. Whatever you have mentioned is fact and truth. So what process should we go so as to unite and achieve the goal. It’s quite diffucult to motivate the oppertunist madhesi having the caste discrimination feeling in inner heart. They love to run after after the Khasiya but hates to talk to madhesi who belongs from the same district. Do you have any solution for this problem before we go for the futher steps.

  • 2. subhash shah  |  December 30, 2006 at 9:27 pm

    ललकारो उन मधेशीयोको
    जो अात्मघृणाका भाषा बोल्ते हैं
    गाँव गाँवमें जाअो
    संगठन िवस्तार करो
    उजाला फैलाअो
    एक क्रान्ित िफर से कर दो

    मधेशके िमट्टीकी कसम
    िफर से कह दो एक बार इन्िकलाब

    thanks very much mr bhagat
    keep it up

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